Sunday, March 20, 2016

Yogwasishth Maharayan : Vairagya prakran : on Celibacy - Bramhacharya

✨✨ब्रह्मचर्यः परं तपः✨✨

🌲🌲योगवासिष्ठ ज्ञान🌲🌲

🌼वैराग्य प्रकरण🌼

🌍रामजी बोले :-  हे मुनीश्वर!
जैसे उन्मत्त
हस्ती जंजीर से बँधता तो स्थिर होता है
कहीं जा नहीं सकता वैसे ही
कामरूपी हस्ती को
जंजीररूपी युवावस्था बन्धन
करती है । युवावस्थारूपी नदी
है उसमें इच्छारूपी तरंग उठते हैं वे कदाचित् शान्ति
नहीं पाते ।

🌍हे मुनीश्वर! यह युवावस्था
बड़ी दुष्ट है । बड़े बुद्धिमान्, निर्मल और प्रसन्न
पुरुष की बुद्धि को भी मलिन कर
डालती है । जैसे निर्मल जल की
बड़ी नदी वर्षाकाल में मलिन हो
जाती है वैसे ही युवावस्था में बुद्धि मलिन
हो जाती है ।

🌍 हे मुनीश्वर!
शरीररूपी वृक्ष है उसमें
युवावस्थारूपी बेलि प्रकट होती है सो पुष्ट
होती जाती है तब चित्तरूपी
भँवरा आ बैठता है और तृष्णारूपी उसकी
सुगन्ध से उन्मत्त होता है, सब विचार भूल जाता है । जैसे जब
प्रबल पवन चलता है तब सूखे पत्रों को उड़ा ले जाता है वैसे
ही युवावस्था वैराग्य; सन्तोषादिक गुणों का अभाव
करती है ।

🌍दुःखरूपी कमल का
युवावस्थारूपी सूर्य है, इसके उदय से सब प्रफुल्लित
हो जाते हैं । इससे सब दुःखों का मूल युवावस्था है । जैसे सूर्य के
उदय से सूर्यमुखी कमल खिल आते हैं वैसे
ही चित्तरूपी कमल संसाररूपी
पँखुरी और सत्यतारूपीसुगन्ध से खिल
आता है और तृष्णारूपी भँवरा उस पर आ बैठता और
विषय की सुगन्ध लेता है ।

🌍 हे मुनीश्वर!
संसार रूपी रात्रि है उसमें युवावस्थारूपी
तारागण प्रकाशते हैं अर्थात् शरीर युवावस्था से सुशोभित
होता है । जैसे धान के छोटे वृक्ष हरे तब तक रहते हैं जबतक
उसमें फल नहीं आता । जब फल आता है तब वृक्ष
सूखने लगते हैं और अन्न परिपक्व होता है वृक्ष की
हरियाली नहीं रह सकती वैसे
ही जब तक जवानी नहीं
आती तब तक शरीर सुन्दर कोमल रहता
है जब जवानी आती है तब
शरीर क्रूर हो जाता है और फिर परिपक्व होकर
क्षीण और वृद्ध होता है ।

🌍 इससे हे
मुनीश्वर! ऐसी दुःख की
मूलरूप युवावस्था की मुझको इच्छा नहीं ।
जैसे समुद्र बड़े जल से तरंगो को पसारता और उछालता है तो
भी मर्यादा नहीं त्यागता, क्योंकि ईश्वर
की आज्ञा मर्यादा में रहने की है और
युवावस्था तो ऐसी है कि शास्त्र और लोक
की मर्यादा मेट के चलती है और उसका
अपना विचार नहीं रहता ।

🌱जैसे अन्धकार में पदार्थ का
ज्ञान नहीं होता वैसे ही युवावस्था में
शुभाशुभ का विचार नहीं होता ।🌱